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सर्प दंशन उपकरण (Snake Biting Apparatus)

 अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर सांप पाए जाते हैं। सांप जमीन पर, समुद्र में, जंगलों में, घास के मैदानों में, झीलों में, और रेगिस्तान में भी पाए जाते है। अधिकांश सांप बिना उकसावे के मनुष्यों के प्रति आक्रामक व्यवहार नहीं दर्शाते हैं। सांप माँसाहारी होते हैं और इनके शिकार में कीड़े, पक्षी, छोटे स्तनधारी, और अन्य सरीसृप, कभी-कभी दूसरें सांप भी शामिल होते हैं। दुनियाभर में केवल 400 से 3000 सांप की प्रजातिया जहरीली है।  भारत में, केवल 330 प्रजातियां हैं और उनमें से केवल 69 प्रजातियां जहरीली है। कई सांप अपने शिकार को कसकर मार देते हैं। इस प्रक्रिया में सांप अपने शिकार के chest के चारो ओर मजबूत पकड बनाता है, जिससे शिकार का दम घुटता है या फिर कई बार कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) के कारण भी शिकार की मृत्यु हो जाती है। सांप कोल्ड ब्लडेड (Cold Blooded) होते है| सर्पदंश से होने वाले लोगो की मृत्यु की कोई निश्चित जानकारी तो नही है, लेकिन डब्ल्यूएचओ (WHO- World Health Organisation) के रिकॉर्ड के अनुसार, दुनिया में हर साल सांप के काटने से लगभग 30000 से 40000 लोगों की मौत हो जाती है।...

श्वसन गुणांक एवम श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक

  श्वसन गुणांक - ✓ श्वसन में मुक्त कार्बन डाई ऑक्साइड व श्वसन में प्रयुक्त ऑक्सीजन का अनुपात ही श्वसन गुणांक कहलाता है। ✓ विभिन्न पदार्थों के श्वसन गुणांक- • कार्बोहाइड्रेट का श्वसन गुणांक 1 होता है। • वसा का श्वसन गुणांक 1 से कम लगभग पाइंट 7 होता है। • प्रोटीन का श्वसन गुणांक भी 1 से कम होता है। • कार्बनिक अम्ल का श्वसन गुणांक 1 से अधिक होता है। • अवायवीय श्वसन का श्वसन गुणांक अनंत होता है। • कार्बोहाइड्रेट के अपूर्ण ऑक्सीकरण का श्वसन गुणांक शून्य होता है। श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक - ✓ तापमान- अनुकूलतम ताप 25 से 50°C पर श्वसन दर अनुकूलतम होती है। तापमान में प्रति 10°C की वृद्धि करने पर श्वसन की दर 2 से 5 गुना हो जाती है, इसे Q10 कहा जाता है। ✓ ऑक्सीजन सांद्रता- ऑक्सीजन की वह सांद्रता जिस पर अवायवीय श्वसन बंद हो जाए व वायवीय ध्वसन शुरू हो जाए, विलोपन बिन्दु कहलाता है। ऑक्सीजन की वह सांद्रता जिस पर अवायवीय व वायवीय दानों प्रकार के श्वसन होते हैं, संक्रमण बिन्दु कहलाता है। ✓ कार्बन डाई ऑक्साइड सांद्रता - कार्बन डाई ऑक्साइड की सांद्रता बढने से श्वसन दर घटती है। ✓ हार्मोन्स - इथ...

इटीएस व ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण

 ✓ यहां NADH2 & FADH2 का अंतिम ऑक्सीकरण होता है। ✓ इटीएस के भिन्न अवयव- • फ्लेवो प्रोटीन या फ्लेविन मोनोन्यूक्लियोटाइड • को एंजाइम क्यू या यूबिक्विनोन • फेरस सल्फेट प्रोटीन • साइटोक्रोम ✓ को एंजाइम क्यू व साइटोक्रोम सी इलेक्ट्रॉन के गतिशील वाहक है, जबकि प्लास्टो क्विनोन व प्लास्टोसायनिन प्रकाश संश्लेषण के गतिशील इलेक्ट्रॉन वाहक है। ✓ इटीएस का अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही ऑक्सीजन है। जबकि अतिम साइटोक्रोम, साइटोक्रोम a3 है। ✓ साइटोक्रोम a3 का ऑक्सीकरण व ऑक्सीजन का अपचयन एंजाइम साइटोक्रोम ऑक्सीडेज द्वारा उत्प्रेरित होता है। ✓ साइनाइड, साइटोक्रोम ऑक्सीडेज का एक अप्रतिस्पर्धात्मक व अनुत्क्रमणीय संदमक है। ✓ कुछ पादपों जैसे, पालक, मटर के माइटोकॉन्ड्रिया में विकल्पी ऑक्सीडेज एंजाइम पाए जाते है तथा इनमें साइनाइड की उपस्थिति में भी इटीएस जारी रहता है। इसे साइनाइड प्रतिरोधी पथ भी कहा जाता है। ✓ इटीएस में सर्वप्रथम 2 इलेक्ट्रॉन फ्लेविन मोनोन्यूक्लियोटाइड से फेरस सल्फेट प्रोटीन को स्थानांतरित होते है। इसी प्रकार ये इलेक्ट्रॉन क्रमशः को एंजाइम क्यू, साइटोक्रोम b, साइटोक्रोम c1, साइटोक्रोम c, साइट...

क्रेब्स चक्र या सिट्रिक एसिड चक्र या TCA चक्र

 ✓ इस चक्र की खोज एच.ए. क्रेब्स ने की थी। ✓ क्रेब्स चक्र के एंजाइम माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में पाए जाते है। अपवादस्वरूप सक्सीनेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम आंतरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली में पाया जाता है। ✓ इसे सिट्रिक एसिड चक्र भी कहा जाता है, क्योंकि इसका प्रथम उत्पाद सिट्रिक एसिड होता है। ✓ सिट्रिक एसिड में तीन कार्बोक्सिलिक समूह पाए जाते है, अतः इसे ट्राई कार्बोक्सिलिक एसिड चक्र या टीसीए चक्र भी कहते है। ✓ क्रेब्स चक्र एक अपघटनीय प्रक्रिया है, परंतु इसके विभिन्न मध्यवर्ती अन्य पदार्थों के संश्लेषण में भी काम आते है। अतः क्रेब्स चक्र को एम्फीबोलिक यानि उभयधर्मी चक्र भी कहा जाता है। ✓ क्रेब्स चक्र में 4 बार ऑक्सीकरण होता है, जिससे 5 NADH2 व एक FADH2 बनता है तथा आधारी स्तर फॉस्फोरिलीकरण द्वारा एक जीटीपी भी बनता है। अतः एक क्रेब्स चक्र द्वारा कुल 12 एटीपी बनती है तथा एक ग्लूकोज अणु के ऑक्सीकरण में क्रेब्स चक्र दो बार चलता है। अतः कुल 24 एटीपी बनती है। ∆ क्रेब्स चक्र की जैव रासायनिक अभिक्रियाऐं - ✓ एसीटाइल को एंजाइम ए व ऑक्जेलो एसीटीक एसिड, सिट्रेट सिंथेटेज एंजाइम की उपस्थिति में सि...

Link reaction (in hindi)

 ✓ इसे गेटवे अभिक्रिया भी कहते है। ✓ यह ग्लाइकोलाइसिस को क्रेब्स चक्र से जोडती है, इसमे श्वसन के दौरान पहली बार ऑक्सीजन काम में आती है तथा कार्बन डाई ऑक्साइड मुक्त होती है। अतः एसीटाइल को एंजाइम ए का निर्माण वायवीय परिस्थितियों में होता है।  ✓ इसमें एक अत्यधिक महत्वपूर्ण जटिल एंजाइम तंत्र पायरूवेट डीहाइड्रोजिनेज कार्य करता है। जिसके 5 घटक है- • निकोटीनामाइड एडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड या एनएडी • थाइमिन पायरोफॉस्फेट या टीपीपी • मैग्नीशियम • को एंजाइम ए • लिपोइक अम्ल या LA  ✓ इस अभिक्रिया में विकार्बोक्सिलीकरण व विहाइड्रोजिनीकरण होता है। अतः इसे ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण भी कहा जाता है। ✓ एसीटाइल को एंजाइम ए, कार्बोहाइड्रेट व वसा उपापचय के बीच लिंकिंग अणु है। ✓ इस अभिक्रिया में पायरूविक अम्ल के 2 अणु, को एंजाइम ए के 2 अणुओं के साथ मिलकर, पायरूविक डीहाइड्रोजिनेज कॉम्पलेक्स की उपस्थिति में एसीटाइल को एंजाइम ए के 2 अणुओं का निर्माण करते है व कार्बन डाई ऑक्साइड के 2 अणु निष्कासित होते है। व NAD के 2 अणु, NADH2 के 2 अणुओं में परिवर्तित हो जाती है।

ग्लाइकोलाइसिस या EMP Pathway

इसे EMP Pathway भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी खोज Embden, Meyerhof, Parnas ने की। • ग्लाइकोलाइसिस वायवीय व अवायवीय श्वसन के बीच एक कॉमन pathway है। • इसमें न तो ऑक्सीजन काम में आती है न ही कार्बन डाई ऑक्साइड मुक्त होती है। • इसमें ग्लूकोज को 2 पायरूविक अम्ल अणुओं में तोडा जाता है। • ग्लाइकोलाइसिस के अधिकतर एंजाइम मैग्नीशियम की उपस्थिति में कार्य करते है। • ग्लाइकोलाइसिस के कुछ मध्यवर्ती पदार्थ संश्लेषण अलभक्रियाओं में काम आते है। अतः इसे अपघटनीय पुनः संश्लेषण या ऑक्सीकारी संश्लेषण भी कहा जाता है। • ग्लाइकोलाइसिस में 4 ATP आधारीय स्तर फॉस्फोलिरीकरण द्वारा बनते है अर्थात् बिना ETS के बनते है। • ग्लाइकोलाइसिस का शुद्ध लाभ 2 ATP व 2 NADH2 होता है। ✓ ग्लाइकोलाइसिस अभिक्रियाएं - • ग्लाइकोलाइसिस में सर्वप्रथम ग्लूकोज, हेक्सोकाइनेज एंजाइम की उपस्थिति में ग्लूकोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है व ATP, ADP में परिवर्तित हो जाती है। • ग्लूकोज-6-फॉस्फेट आइसोमरेज एंजाइम की उपस्थिति में फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट में परिवर्तित हो जाता है। • फ्रक्टोज-6-फॉस्फेट फॉस्फोफ्रक्टो काइनेज की उपस्थिति में फ्रक्टोज ...

श्वसन रासायनिकी और श्वसन के प्रकार (Respiration Chemistry)

 श्वसन क्या होता है? (What is Respiration?) श्व सन एक एम्फीबोलिक (Amphibolic) मुख्यतया केटाबॉलिक व ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया है। श्वसन जीवित कोशिकाओं का अति आवश्यक लक्षण है। श्वसनी पदार्थ क्या होते है? (Respiration Substances) श्वसन के दौरान श्वसनी पदार्थ के उपयोग का कम कुछ इस प्रकार रहता है कि सबसे पहले काबोहाइड्रेट उसके बाद वसा व सबसे अंत में प्रोटीन का उपयोग होता है। 1 ग्राम काबोहाइड्रेट के उपयोग से 4 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। 1 ग्राम वसा के उपयोग से 9 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। 1 ग्राम प्रोटीन के उपयोग से 4 से 5 किलो कैलोरी तक ऊर्जा प्राप्त होती है। प्लावी श्वसन - जब श्वसनी पदार्थ के रूप में काबोहाइड्रेट व वसा का उपयोग होता है, तो यह प्लावी श्वसन कहलाता है। जीवद्रव्यी श्वसन - जब श्वसनी पदार्थ के रूप में प्रोटीन्स का उपयोग होता है, तो यह जीवद्रव्यी श्वसन कहलाता है, ऐसा भूखमरी की अवस्था में होता है।अपवादस्वरूप legume पादपों में बीजों के अंकुरण के समय श्वसनी पदार्थ के रूप में प्रोटीन का उपयोग होता है, परन्तु इसे प्लावी श्वसन ही कहते है। ✓श्वसन के प्रकार - वायवीय श्वसन...

रेडियो इम्यूनो एसे (Radio Immuno Assay)

  परिचय (Introduction) :- रेडियो इम्यूनो एसे एंटीजन एवम् एंटीबॉडी के परीक्षण की एक विधि है। यह तकनीक 1960 में S.A. Berson और Rosalyn Yalow द्वारा विकसित की गई। RIA का सिद्धान्त रेडियो चिह्नित एंटीजन और अचिह्नित एंटीजन के एंटीबॉडी से प्रतियोगी बंधन पर आधारित है। प्रक्रिया (Process):- चिह्नित एंटीजन को एक विशिष्ट सांद्रता, जो कि एंटीबॉडी की एंटीजन बाइंडिंग स्थल को संतृप्त कर देती है, पर एंटीबॉडी के साथ मिश्रित किया जाता है। इसके बाद अचिह्नित एंटीजन जिसकी सांद्रता ज्ञात नहीं है, को बढ़ती हुई मात्रा में मिलाया जाता है। अब ये दोनो प्रकार की एंटीजन, एंटीबॉडी से बंधन के लिए प्रतिस्पर्धा करती है। जैसे जैसे अचिह्नित एंटीजन की मात्रा को बढ़ाया जाता है, बंधन स्थलों से चिह्नित एंटीजन प्रतिस्थापित होती जाती है। विशिष्ट एंटीबॉडी से बंधित रेडियो चिह्नित एंटीजन की मात्रा में कमी से नमूने में उपस्थित एंटीजन की मात्रा ज्ञात की जाती है। एंटीजन को सामान्यत: गामा उत्सर्जी आइसोटोप जैसे - 125I से चिह्नित किया जाता है। लेकिन कभी कभी बीटा उत्सर्जी आइसोटोप जैसे - ट्रिटियम का उपयोग भी कर लिया जाता है। य...

एलिसा एवम् ELISA के प्रकार (ELISA & Types of ELISA)

  एंजाइम लिंक्ड इम्यूनो सॉरबेंट एसे (Enzyme-linked immunosorbent assay) को सामान्यत: एलिसा (ELISA or EIA) के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धांतत: तो रेडियो इम्यूनो एसे (Radio immuno assay - RIA) के समान ही है, परंतु यह रेडियो सक्रिय चिह्न के स्थान पर एंजाइम पर निर्भर है। जब प्रतिरक्षी किसी ऐसे रंगहीन पदार्थ के साथ क्रिया करके रंगीन उत्पाद बनाती है, तो ऐसा रंगहीन पदार्थ क्रोमोजेनिक सबस्ट्रेट (Chromogenic Substrate) कहलाता है। एंजाइम जो ELISA परीक्षण में उपयोग में लिए जाते है -  alkaline phosphatase, horse radish peroxidase, and galactosidase. यह परीक्षण RIA की तुलना में सुरक्षित एवम् कम लागत वाला है। ELISA के प्रकार (Types of ELISA):- गुणवत्ता एवम् संख्या या प्रतिरक्षी-प्रतिजन के आधार पर ELISA के विभिन्न प्रकार है। ELISA का प्रत्येक प्रकार गुणवत्ता के आधार पर प्रतिरक्षी और प्रतिजन की उपस्थिति जांचने में उपयोगी है। इसी प्रकार प्रतिजन व प्रतिरक्षी की सांद्रता के मानक वक्र से किसी नमूने की अज्ञात सांद्रता ज्ञात की जा सकती है। 1.अप्रत्यक्ष एलिसा (Indirect ELISA) :- अप्रत्यक्ष एलिसा...

जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering)

  जेनेटिक इंजीनियरिंग क्या है? जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तकनीक है जिसमें जीवों के अनुकूल विशेषताओं को प्राप्त करने के लिए उनके जीनों में बदलाव किये जाते हैं। इस तकनीक से, वैज्ञानिक विभिन्न जीनों को एक जीव से दूसरे जीव में स्थापित कर सकते हैं। जेनेटिक इंजीनियरिंग के उपयोग से, मानव और जीवों में उपयोगी गुणों को प्राप्त किया जा सकता है जैसे कि बीमारियों के इलाज, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादन। इस तकनीक का उपयोग लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है जो कि प्रकृति द्वारा नहीं हो सकती है। Image Source - askyack.com जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तकनीक है जिसमें जीवों के जीनों में बदलाव किये जाते हैं। जीनों में ये बदलाव वैज्ञानिक द्वारा किए जाते हैं ताकि जीवों के विशिष्ट विशेषताओं को बढ़ावा दिया जा सके। जेनेटिक इंजीनियरिंग के उपयोग - जेनेटिक इंजीनियरिंग के उपयोग से, मानव और जीवों में उपयोगी गुणों को प्राप्त किया जा सकता है जैसे कि बीमारियों के इलाज, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादन। जैसे कि जीवों के जीनों में परिवर्तन करके, दीर्घ विरासत में मौजूद बीमारियों के लक्षणों को रोका जा सकता है और स्वस्थ ज...

ट्रांसपोंसन्स / जंपिंग जीन क्या होते है? (What is Transposon?)

 ट्रांसपोंसन्स को जंपिंग जीन, मोबाइल जेनेटिक एलिमेंट्स या ट्रांसपोजेबल एलिमेंट्स भी कहा जाता है, वे डीएनए अनुक्रम हैं जो क्रोमोसोम पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की क्षमता रखते हैं। 1940 के दशक में मक्का के आनुवंशिकी का अध्ययन करते समय उन्हें बारबरा मैक्लिंटॉक द्वारा खोजा गया था। Image Source - askyack.com जीवाणुओं से लेकर मनुष्यों तक, सभी जीवों में ट्रांसपोज़न पाए जा सकते हैं। उन्हें दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: डीएनए ट्रांसपोज़न और रेट्रोट्रांसपोज़न। डीएनए ट्रांसपोज़न एक "कट-एंड-पेस्ट" तंत्र द्वारा चलते हैं, जहां ट्रांसपोज़न को एक स्थान से हटाकर दूसरे में डाला जाता है। रेट्रोट्रांसपोंस एक "कॉपी-एंड-पेस्ट" तंत्र द्वारा चलते हैं, जहां ट्रांसपोसॉन को पहले आरएनए में लिप्यंतरित किया जाता है, और फिर वापस डीएनए में अनुलेखित किया जाता है और एक नए स्थान में डाला जाता है। ट्रांसपोज़न के जीनोम पर विभिन्न प्रभाव हो सकते हैं। वे कोडिंग क्षेत्रों में सम्मिलित करके जीन को बाधित कर सकते हैं, नियामक क्षेत्रों में सम्मिलित करके जीन अभिव्यक्ति को बदल सकते हैं...

कॉफी आपको कैसे जगाए रखती है? (How does Coffee wake you up?)

 जब हम अपने दैनिक कार्य जैसे सोच और खेल करते हैं। एडेनोसिन (Adenosine) नामक एक उपोत्पाद का उत्पादन किया जाता है। एडेनोसिन मस्तिष्क की गतिविधि को धीमा कर देता है। हमारे मस्तिष्क में, एडेनोसाइन रिसेप्टर्स होते हैं जो इस एडेनोसाइन के लिए पूरी तरह से ढल जाते हैं। जब एडेनोसाइन इन रिसेप्टर्स को बांधता है, तो यह उन्हें सक्रिय करता है। जिससे मस्तिष्क की गतिविधि धीमी हो जाती है और इस प्रकार, हमें नींद आने लगती है। Image Source - askyack.com हालांकि, कॉफी पीने से हम जागते रहते हैं और हमें नींद नहीं आती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कॉफी में कैफीन (Caffeine) नामक एक पदार्थ होता है जो पाचन के बाद हमारे मस्तिष्क तक पहुंचती है। कैफीन संरचनात्मक रूप से एडीनोसिन के समान है। समान होने के नाते, कैफीन एडेनोसाइन रिसेप्टर्स को बांधता है और इस प्रकार, एडेनोसाइन को बंधन से रोकता है। इसलिए हमारे रिसेप्टर्स मस्तिष्क की गतिविधि को धीमा नहीं करते हैं। और इस प्रकार कॉफी हमे जगाए रखती है।

अंग क्यों सो जाते हैं? (Why do limbs fall asleep?)

 यह मूल रूप से तंत्रिकाओं (Nerves) के कारण होता है। तंत्रिकाओं के माध्यम से, हमारा मस्तिष्क हमारे अंगों के साथ संचार करता है। हालांकि, जब हम अपने पैरों को क्रॉस करके बैठते हैं (एक पैर के ऊपर दूसरा पैर रखकर बैठते है) या बहुत देर तक बांह पर सोते हैं, तो हम दबाव लागू करते हैं। जिससे तंत्रिका मार्ग और इसके आसपास की धमनियां सिकुड़ जाती हैं। इसलिए, तंत्रिका ठीक से काम नहीं करती हैं और धमनियां तंत्रिकाओं को आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति नहीं कर सकती हैं। परिणामस्वरूप, हमारे मस्तिष्क द्वारा भेजे गए संकेत अंग तक नहीं पहुंचते हैं। तो, हम कहते हैं कि हमारा अंग सो गया है। इसके अलावा, कुछ स्थितियों में, इनमें से कुछ तंत्रिका संकेत भेजना बंद कर देते हैं। जबकि कुछ अत्यधिक सक्रीय (Hyper-actively) रूप से संकेत भेजती है| इससे हमें पिन और सुइयों की अनुभूति होती है।

वर्णांधता क्या है? (What is Color blindness?)

Image source - askyack.com  वर्णांधता या रंग की कमी एक दृष्टि समस्या (Vision Problem) है। हमारी आँखों में छड़ (Rods) और शंकु (Cones) नामक हल्की संवेदनशील कोशिकाएँ (Sensitive Cells) हैं। छड़ें काले और सफेद दृष्टि (Black &White Vision) के लिए जिम्मेदार हैं। वे रंग का पता नहीं लगाते हैं। जबकि शंकु रंग का पता लगाता है। शंकु तीन प्रकार के होते हैं:- एक शंकु लाल प्रकाश को देखने में सहायता करता है, दूसरा हरे रंग को देखने में सहायता करता है और तीसरा नीला रंग को देखने में सहायता करता है। साथ में ये शंकु हमें रंगों के पूरे स्पेक्ट्रम (Spectrum)को देखने में मदद करते हैं।  कुछ मामलों में, जब एक या अधिक प्रकार के शंकु ठीक से काम नहीं करते हैं। इससे वर्णांधता होती है। ऐसी कमी वाले लोगों को कुछ रंगों या रंगों के बीच अंतर करने में कठिनाई होती है। 

निकट दृष्टि दोष (Myopia)

 जब किसी वस्तु से प्रकाश हमारी आँखों में प्रवेश करता है। हमारी आंख का लेंस (Lens) इसे ऐसे मोड़ देता है जिससे कि छवि (Image) रेटिना पर बनती है। हालांकि, कुछ लोगों में, यह छवि रेटिना (Retina) से पहले बनती है। इस तरह के दोष को निकटता या मायोपिया (Myopia) कहा जाता है।       निकट दृष्टि वाले व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं। क्योंकि रेटिना पर दूर की वस्तु की छवि को केंद्रित करने के लिए, हमारी आंख का लेंस संकुचित हो जाता है। जबकि मायोपिया वाले लोगों में, लेंस पर्याप्त रूप से संकुचित नहीं हो सकता है। इस प्रकार, रेटिना से पहले छवि बनती है और इसे देखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, जब नेत्रगोलक (Eye-ball) सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। लेंस और रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाती है, जिससे रेटिना से पहले छवि का निर्माण होता है। इस प्रकार, दूर की वस्तु को देखने में कठिनाई होती है।

शुष्क बर्फ क्यों खतरनाक होती हैं? (Why dry ice is dangerous?)

 ठोस कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2)को शुष्क बर्फ कहा जाता हैं। शुष्क बर्फ को पृष्ठ ताप (Surface Temperature) लगभग -78 डिग्री सेल्सियस / -109 डिग्री फारेनहाइट होता है। इसका अर्थ है कि यह सामान्य बर्फ जो कि जल से निर्मित होती हैं, से ज्यादा ठण्डी होती हैं। अगर हमारी त्वचा शुष्क बर्फ के संपर्क में आ जाए तो हमारी कोशिकाओं कुछ ही सैकेण्डस में मरना शुरू हो जाएगी, इस प्रकार हमें शीतदंश (Frostbite) की अनुभूति होगी। इसी प्रकार शुष्क बर्फ को सीलबंद डिब्बे (Air tight container) में रखना भी खतरनाक हो सकता है, क्योंकि सीलबंद डिब्बे में रखने पर अधिक दाब के कारण यह ठोस अवस्था से सीधे ही गैस अवस्था में परिवर्तित होना शुरू हो जाएगी, जिससे डिब्बे की दीवारों पर बहुत अधिक दबाब पड़ेगा, जो कि एक भयानक विस्फोट (Dangerous Explosion) में बदल सकता हैं।

जैविक हथियार(Biological Weapons)

ऐसे जीवाणु, विषाणु, कवक और अन्य जहरीले जीव जिनका प्रयोग करके मनुष्य, जानवरों व पादपों को नुकसान पहुँचाया जा सकता है, जैविक हथियार (Biological Weapons) कहलाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के अनुसार जैविक हथियारों को 3 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया हैं :- 1.श्रेणी-ए (Category-A) 2.श्रेणी-बी (Category-B) 3.श्रेणी-सी (Category-C) 1.श्रेणी-ए (Category-A) :- ऐसे जैविक हथियार जिन्हें आसानी से फैलाया जा सकता हैं तथा इन्हें नियंत्रित करने के लिए अधिक प्रयास की आवश्यकता होती हैं। ये निम्न हैः- क. इबोला (Ebola) :- यह एक वायरस हैं। इसका नाम कांगो देश की एक नदी के नाम पर रखा गया हैं। यह एक घातक वायरस हैं। ख. एन्थ्रेक्स (Anthrax) :- यह रोग बैसीलस एन्थ्रेसिस (Baccilus anthresis)   नामक जीवाणु से होता हैं। यह एक संक्रामक रोग हैं। यह सामान्यतः पशुओं में होता हैं। इस रोग में शरीर पर घाव हो जाते हैं। ग. प्लेग (Plague) :- यह रोग यार्शीनिया पेस्टिस (Yarsinia pestis)   नामक जीवाणु से होता हैं। इस जीवाणु का प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने चीन के विरूद्ध किया था। घ. बोटुलिज्म (Botulism...

BMI क्या है? (What is BMI?)

 बीएमआई (BMI) का अर्थ शरीर द्रव्यमान सूचकांक (Body Mass Index) होता हैं। इसके द्वारा यह पता लगाया जाता है कि हमारा वजन हमारी लंबाई के अनुसार सही है या नहीं। BMI निकालने के लिए हमें वजन (किलोग्राम में) को लंबाई (वर्ग मीटर में) से विभाजित करना होता हैं। 18.49 से कम BMI दर्शाता है कि हमारा वजन कम है, जबकि 18.50 से 24.99 तक का BMI यह दर्शाता है कि हमारा वजन सामान्य हैं और 25 से 29.99 तक का BMI दर्शाता है कि हमारा वजन अधिक हैं, 30 से अधिक BMI मोटापा (Obesity) दर्शाता हैं।  लेकिन कुछ विद्वान इसे गलत मानते हैं, क्योंकि BMI से चर्बी (Fat) व पेशी द्रव्यमान (Muscle Mass) में अंतर नहीं किया जा सकता हैं। जैसे- यदि किसी व्यक्ति का पेशी द्रव्यमान अधिक है, तो BMI के अनुसार वह मोटा होगा, जबकि कोई व्यक्ति जिसके पेशी द्रव्यमान कम है और चर्बी अधिक है, तो वह BMI के अनुसार हृष्ट-पुष्ट होगा। और वैसे भी BMI आयु अनुसार विभाजित नहीं किया गया हैं। अतः इसे पूर्णतः सही नहीं माना जा सकता हैं।

प्रोटोजोआ जनित रोग (Protozoan Diseases)

1. अमीबीएसिस (Amoebiasis) - रोगजनक (Pathogen) - एन्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolitica) । लक्षण (Symptoms) - ग्रसित व्यक्ति के मल के साथ म्यूकस व रक्त निकलता हैं। आंतों में ऐंठन होती हैं। बड़ी आंतों (कोलन) में अल्सर हो जाते हैं , यकृत को प्रभावित करता हैं , जिससे अमीबीय हिपेटाइटिस हो जाता हैं। बचाव के उपाय (Precautions) - सब्जियों को भली-भांति धोकर उपयोग में लेना , अमीबीय पुटिकाओं को क्लोरीन , फीनॉल , क्रीसोल द्वारा नष्ट किया जाना चाहिए। उपचार (Treatment) - प्रतिजैविक पदार्थों जैसे- टेट्रासाइक्लीन (Tetracycline), टेरामाइसीन (Pteromycine) का उपचार में उपयोग किया जाता हैं।   2. मलेरिया (Malaria) 🦟 - मलेरिया मनुष्य में मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता हैं। मच्छर की लार में प्लाज्मोडियम रोगजनक उपस्थित होता हैं। रोगजनक (Pathogen) - प्लाज्मोडियम (Plasmodium) की चार जातियां हैं , जो कि निम्नानुसार हैं - Ⅰ . प्लाज्मोडियम वाइवेक्स (P. vivax) Ⅱ . प्लाज्मोडियम ऑवेल (P. ovel) Ⅲ . प्लाजमोडियम मलैरी (P. malari) Ⅳ . प्लाज्मोडियम फैल्सीफेरम (...