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कुपोषण के कारण होने वाले रोग (Diseases due to Malnutrition)

1. प्रोटीन की कमी के कारण होने वाले रोग (Diseases due to Protein deficiency) - मनुष्य को शारीरिक विकास के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती हैं। बच्चों में प्रोटीन की कमी से सर्वाधिक कुपोषण होता हैं। जिससे दो मुख्य रोग होते हैं -   Ⅰ . क्वाशियोरकोर (Kwashiorkor) - यह प्रोटीन की कमी के कारण हाने वाला रोग हैं। इसके मुख्य लक्षण जैसे- भूख कम लगना , शरीर सूज कर फूलना , त्वचा पीली व शुष्क होना और चिड़चिड़ा होना।   Ⅱ . मैरेस्मस (Marasmus) - यह रोग भोजन में प्रोटीन व कैलोरी दोनों की कमी से होता हैं। इसमें शरीर सूखने लगता हैं , रोगी दुबला-पतला , चेहरा दुर्बल तथा आंखें कांतिहीन और अंदर धंसी-सी हो जाती हैं।   2. कार्बोहाइड्रेट की कमी से होने वाले रोग (Diseases due to Carbohydrate deficiency) - स्ंतुलित भोजन में कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत होता हैं , इस कारण इसकी कमी से कई सारे गंभीर रोग हो जाते हैं।   Ⅰ . हाइपोग्लाईसीमिया (Hypoglycemia) - कार्बोहाइड्रेट की कमी से ग्लूकोज की शरीर में अनुपलब्धता से रक्त शर्करा के स्तर में गिरावट हो जाती है...

कुपोषण (Malnutrition)

अधिकांश भारतीयों के भोजन में चाहे वह गरीब हो या अमीर , वृद्ध हो या युवा , स्त्री हो या पुरूष , गर्भवती माता हो या धात्री , किसी-न-किसी पौष्टिक तत्वों की अधिकता या कमी रहती ही हैं। विशेषकर गरीब किसान , मजदूर तथा निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों का भोजन गुणात्मक (Qualitative) तथा परिमाणात्मक (Quantitative) दोनों ही दृष्टि से अपर्याप्त होता हैं।           भारत की अधिकांश गरीब जनता को प्रतिदिन सुबह-शाम भरपेट दाल-रोटी भी नसीब नहीं होती हैं। अतः वे प्रोटीन-कैलोरी कुपोषण से भयंकर रूप से पीड़ित होते हैं। कुछ गरीब परिवार के बालकों को भरपेट अनाज (Cereals) भी नहीं मिलता हैं , परिणामतः उनके शरीर में ऊर्जा उत्पादक भोज्य तत्वों की भी कमी होती हैं तथा वे निर्बल , कमजोर , निशक्त एवं थके-थके दिखाई देते हैं। गर्भवती तथा धात्री माता की दशा भी कम दयनीय नहीं हैं।             विश्व के कई देश कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण तीव्र व दीर्घकालिक रोगों में आमतौर पर पाया जाता हैं। अस्पतालों में भर्ती वयस्क व्यक्तियों में...

ग्राही (Receptors)

किसी वस्तु से स्पर्श करने पर धनात्मक अनुक्रिया या ऋणात्मक अनुक्रिया को स्पर्शानुचलन (Thigmotaxis) कहते हैं। जन्तुओं में त्वचा ही प्रमुख स्पर्शग्राही (Thigmo receptor or tactile receptor) होती हैं। त्वचा ही प्रमुख रूप से पीड़ा ग्राही (Pain receptors) होती हैं। सभी त्वक ग्राही संरचना में सरल होते हैं। कुछ त्वक ग्राही एक कोशिकीय (Unicellular) और कुछ बहुकोशिकीय (Multicellular) होते हैं। कुछ त्वकग्राही तंत्रिकाओं के अंतिम सिरे भी होते हैं। स्तनधारियों के त्वचा की डर्मिस में कई प्रकार के ग्राही अंग पाए जाते हैं। जिनमें निम्न प्रमुख हैं -   1. स्पर्श ग्राही (Thigmo receptors) - स्पर्शग्राही त्वचा की एपिडर्मिस के ठीक नीचे स्थित होते हैं। ये स्पर्श द्वारा उद्दीपित होते हैं। स्पर्शग्राही का निर्माण तंत्रिका तंतु के अंतिम सिरे करते हैं , जो बहुत-सी शाखाओं में विभाजित होते हैं। कभी-कभी इन स्वतंत्र सिरों को संयोजी ऊत्तक चारों ओर से घेर लेते हैं एवं पुटिका सी संरचना बनाते हैं , वे एपिडर्मिस की स्तर में छोटे-छोटे उभार से बना लेते हैं। इनको ‘माइसनर कॉर्पुसल्स’ (Meissner’s corpuscles) ...

तंत्रिकीय तंत्र से संबंधित रोग (Disorders of Nervous System)

Disorders of Nervous System 1. न्यूराइटिस (Neuritis) - यह तंत्रिकीय कोशिकाओं में रोगाणुओं द्वारा होने वाला संक्रमण हैं। यह मुख्य रूप से परिधिय तंत्रिका तंत्र में पाया जाता हैं।   2. मेनिन्जाइटिस (Meningitis) - यह मस्तिष्क तथा मेरूरज्जु के सुरक्षात्मक आवरण ( अर्थात् मेनिन्जेस झिल्लियों) में होने वाला संक्रमण हैं , जो मुख्य रूप से जीवाणु या विषाणु द्वारा फैलता हैं।   3. पार्किन्सन्स डिजीज (Parkinson’s Disease) - यह आनुवंशिक कारक अथवा विशिष्ट जीवन शैली के कारण उत्पन्न होने वाला रोग हैं। इस रोग में मस्तिष्क में पृष्ठिय गैंग्लियॉन क्षतिग्रस्त हो जाते हैं , जिसके फलस्वरूप डोपेमिन (Dopamine) के स्त्रवण में कमी होने लगती हैं , इसके कारण रोगी की ऐच्छिक क्रियाओं का नियमन धीमा हो जाता हैं अथवा रूक जाता हैं। रोग के प्रारंभिक लक्षणों में ऐच्छिक गतियों के दौरान उत्पन्न होने वाली झूझन अथवा कंपन्न (Tremor and Shivering) दिखाई देते हैं।  

मानव कर्ण (Human Ear)

कर्ण मनुष्य का संवेदी अंग हैं , जो निम्नलिखित कार्य सम्पन्न करता हैं - - सुनने में सहायता प्रदान करना। - शरीर के संतुलन को बनाए रखने में सहायता प्रदान करना।   कर्ण की आंतरिक संरचना - Human Ear आंतरिक संरचना में कर्ण को तीन भागों में विभक्त किया गया हैं , जो निम्न हैं - 1. बाह्य कर्ण - इस भाग में निम्नलिखित संरचनाऐं मौजूद होती हैं - अ.कर्ण पिन्ना - यह प्रत्यास्थ उपास्थि से निर्मित भाग हैं , जो मनुष्यों में अगतिशील होता हैं , जबकि निम्न कशेरूकियों में यह गतिशील अवस्था में पाया जाता हैं , जहाँ यह ध्वनि तरंगों को ग्रहण करने में सहायता प्रदान करता हैं।   ब. कर्ण कुहर - यह कर्ण पिन्ना में उपस्थित छिद्रनुमा संरचना हैं , जो ध्वनि तरंगों को ग्रहण करने में सहायता प्रदान करती हैं।   स. बाह्य कर्ण नाल - यह नलिकाकार संरचना हैं , जो बाह्य कर्ण को मध्य कर्ण से जोड़ने का कार्य करती हैं , इसके अंदर विशिष्ट प्रकार की ग्रन्थिल संरचना उपस्थित होती हैं , जिसे सेरूमिनस ग्रन्थि कहा जाता हैं , इस ग्रन्थि द्वारा पीले रंग के मोम रूपी पदार्थ का स्त्रवण होता हैं , जिस...

नेत्र से संबंधित रोग (Disorders of Eye)

Eye Disease 1. निकट दृष्टि दोष (Myopia) - इस रोग में व्यक्ति को निकट की वस्तु तो स्पष्ट दिखाई देती हैं , जबकि दूर की वस्तु अस्पष्ट दिखाई देती हैं। इस रोग में नेत्र लैंस की शक्ति बढ़ जाती हैं अथवा नेत्र गोलक का आकार बढ़ जाता हैं , जिसके फलस्वरूप वस्तु के प्रतिबिम्ब का निर्माण रेटीना परत से पहले होने लगता हैं। इसके निवारण हेतु उचित शक्ति के अवतल लैंस का उपयोग करने की सलाह दी जाती हैं।   2. दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia) - इस रोग में व्यक्ति को दूर की वस्तुऐ तो स्पष्ट दिखाई देती हैं , जबकि निकट की वस्तुऐं अस्पष्ट दिखाई देती हैं। यह नेत्र लैंस की शक्ति कम होने अथवा नेत्र गोलक के आकार के कम होने के कारण होता हैं , जिसके फलस्वरूप वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटीना परत के बाद में निर्मित होने लगता हैं। इसके निवारण हेतु उचित शक्ति के उत्तल लैंस का प्रयोग करने की सलाह दी जाती हैं।  

मानव नेत्र (Human Eye)

वातावरण के परिवर्तनों की पहचान हम विभिन्न अंगों द्वारा करते हैं। वे अंग जो वातावरण की संवेदनाओं को ग्रहण करने का कार्य करते हैं , संवेदी अंग कहलाते हैं। संवेदी अंगों के द्वारा इन वातावरणीय संवेदनाओं को ग्रहण कर मस्तिष्क के विभिन्न भागों तक भेजा जाता हैं। मनुष्य में ये संवेदी अंग पाँच होते हैं- कान , नाक , जीभ , त्वचा तथा नेत्र।   मानव नेत्र (Human Eye) - मनुष्य की खोपड़ी में एक जोड़ी नेत्र , नेत्र गर्तिका में स्थित होते हैं , इस गर्तिका को नेत्र कोटर कहते हैं।   नेत्र की संरचना (Structure of Eye) - Human Eye