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आंतरिक सुरक्षा क्रियाविधि (Internal Defence Mechanism)

हमारे शरीर में 2 प्रकार की आन्तरिक सुरक्षा क्रियाविधि पाई जाती हैं -

1.अविशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि (Non-specific defense mechanism)

2. विशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि (Specific defense mechanism)

 

1.अविशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि (Non-specific defense mechanism) -

पेथोजन के विपरीत प्रथम सुरक्षा कवच हमारे शरीर में त्वचा होती हैं। त्वचा अवरोधक का कार्य करती हैं। त्वचा शरीर में रोगाणुओं, जीवाणुओं तथा परजीवियों को शरीर में प्रवेश करने से रोकती हैं। दूसरा अविशिष्ट सुरक्षा त्वचा द्वारा स्त्रावित पसीना एवं सीबम (Sweat and Sebum) होता हैं, जिसमें कई रसायन होते हैं, जो कई प्रकार के जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं।

 

          सूक्ष्मजीव जो भोजन के साथ प्रवेश करते हैं, वे आमाशय द्वारा स्त्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) एवं एंजाइम द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं। जो रोगाणु श्वसन में हवा के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं वे नाक के रोमों द्वारा छान लिए जाते हैं। श्वसन पथ में म्यूकस द्वारा रोक लिए जाते हैं एवं फेगोसाइटोसिस द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं।

 

अगर रोगाणु ऊत्तक में प्रवेश कर जाते हैं, तो दूसरी अविशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि सक्रिय हो जाती हैं। कुछ विशेष प्रकार की कोशिकाएं जब विषाणु या अंतःकोशीय परजीवी से संक्रमित हो जाते हैं, तो एक विशेष प्रकार की प्रोटीन जिसे इन्टरफेरोन्स (Interferon) कहते हैं, स्त्रावित होती हैं। यह प्रोटीन का समूह अन्य कोशिकाओं के एण्टीवाइरल प्रोटीन स्त्रावित करने के लिए उद्दीपित करता हैं। ये कोशिका को विषाणु द्वारा आवश्यक वृहत अणुओं के निर्माण को रोकते हैं। इन्टरफेरोन्स प्राकृतिक मारक कोशिका (Natural Killer Cells; NKC) को उद्दीपित करते हैं, ये कोशिकायें परपोषी की संक्रमित कोशिकाओं को पहचानते हैं एवं उन्हें शीघ्र मार देते हैं। यहाँ दो अविशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधियों का वर्णन किया जा रहा हैं -

 

.शोथ (Inflammation)-

जब रोगाणु ऊत्तक में प्रवेश कर जाते हैं वे शोथ अनुक्रियाओं को प्रारम्भ करते हैं। प्रभावित क्षेत्र में रूधिर वाहिनियां चौड़ी हो जाती हैं एवं रूधिर प्रवाह बढ़ जाता हैं। बढ़े हुए रूधिर प्रवाह से त्वचा लाल दिखाई देती हैं एवं उष्णता महसूस होती हैं। शोथ क्षेत्र में कोशिकाओं में पारगम्यता बढ़ जाती हैं। परिणामस्वरूप अधिक द्रव्य ऊत्तकों में प्रवेश करता हैं। ज्यों-ज्यों द्रव्य की मात्रा बढ़ती हैं, एडीमा (Edema) या सूजन बढ़ती हैं। सूजन से दर्द बढ़ता हैं, जो शोथ का प्रमुख लक्षण है। अतः शोथ के क्लिनिकल लक्षण लाली, ताप, सूजन एवं दर्द होता हैं।

 

          शोथ के दौरान बढ़ा हुआ रूधिर प्रवाह अत्यधिक संख्या में फेगोसाइटिक कोशिकाएं संक्रमित क्षेत्र में लाते हैं। बढ़ी हुई पारगम्यता रूधिर वाहिनियों को गामा ग्लोब्यूलिन की आवश्यकता होती हैं, जो प्रतिरक्षी का कार्य करते हैं। शोथ का प्रमुख लक्षण बुखार का आना होता हैं।

 

. फेगोसाइटोसिस (Phagocytosis) -

शोथ का प्रमुख कार्य फेगोसाइटोसिस में वृद्धि हैं। फेगोसाइट जीवाणुओं और अन्य सूक्ष्मजीवों को अर्न्तग्रहण कर लेते हैं। यह कोशिका झिल्ली द्वारा होता हैं एवं कई आशय मुक्त होते हैं, जिन्हें फेगोसोम (Phagosome) कहते हैं।

 

          एन्डोसाइटोसिस द्वारा ग्रहण किए गए कोशिका बाह्य पदार्थों का पाचन विषम भक्षण कहलाता हैं। एन्डोसाइटोसिस के अन्तर्गत कोशिकाबाह्य पदार्थ के कण अन्तर्वलित जीव-द्रव्य कला से घिर कर एन्डोसोम (फेगोसोम) बनते हैं। एन्डोसोम व प्राथमिक लाइसोसोम संयुक्त होकर द्वितीयक लाइसोसोम बना लेते हैं। द्वितीयक लाइसोसोम में एन्डोसाइटोसिस द्वारा ग्रहण किए गए पदार्थों का पाचन हो जाता हैं। पचित पदार्थ लाइसोसोम से बाहर विसरित हो जाते हैं तथा लाइसोसोम के शेष बचे अवशेष अवशिष्ट काय बना लेते हैं।

 

 

2. विशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि (Specific defense mechanism)-

अविशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि रोगाणुओं को नष्ट करते हैं एवं संक्रमण को फैलने से रोकते हैं, जबकि विशिष्ट सुरक्षा क्रियाविधि सक्रिय होती हैं। कई दिन विशिष्ट प्रतिरक्षी अनुक्रियाओं के सक्रिय करने में लग जाते हैं। अगर एक बार क्रिया प्रारम्भ हो जाती हैं, तो प्रतिक्रिया अत्यधिक प्रभावी होती हैं। दो प्रकार की मुख्य विशिष्ट प्रतिरक्षी क्रिया विधि निम्न हैं -

 

. कोशिका मध्यस्थता प्रतिरक्षा / टी-कोशिका प्रतिरक्षा (Cell Mediated Immunity; CMI / T-Cell Immunity) -

इस प्रकार की प्रतिरक्षा में काफी संख्या में टी-लिम्फोसाइट्स सक्रिय होकर रोगजनकों को नष्ट करते हैं।

 

. प्रतिरक्षी मध्यस्थता प्रतिरक्षा / ह्यूमोरल प्रतिरक्षा / बी-कोशिका प्रतिरक्षा (Antibody Mediated Immunity; AMI / Humoral Immunity / B-Cell Immunity) -

इस प्रकार की प्रतिरक्षा में शरीर में प्रतिरक्षी (Antibodies) विकसित होती हैं। इस प्रकार की प्रतिरक्षा में मुख्यतया बी-लिम्फोसाइट्स प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

 

 

कोशिका मध्यस्थता प्रतिरक्षा व प्रतिरक्षी मध्यस्थता प्रतिरक्षा में अन्तर -

कोशिका मध्यस्थता प्रतिरक्षा

 प्रतिरक्षी मध्यस्थता प्रतिरक्षा

यह प्रतिरक्षा लंबे समय तक बनी रहती हैं।

 यह प्रतिरक्षा कुछ महिनों ही उपस्थित रहती हैं।

यह प्रतिरक्षा टी-लिम्फोसाइट्स द्वारा प्रेरित होती हैं।

 यह प्रतिरक्षा बी-लिम्फोसाइट्स द्वारा प्रेरित होती हैं।

इस प्रतिरक्षा में लिम्फोकाइन का स्त्राव होता हैं।

 इस प्रतिरक्षा में प्रतिरक्षी का उत्पादन होता हैं।

यह प्रतिरक्षा रक्त एवं लसिकीय ऊत्तकों में उपस्थित होती हैं।

 यह प्रतिरक्षा रक्त प्लाज्मा, लसिका एवं श्लेष्मा स्त्राव में उपस्थित होती हैं।

यह प्रतिरक्षा जीवाणु एवं वायरस के अलावा कवक, प्रोटोजोअन्स, हेलमिन्थ, कैन्सर एवं अंग प्रत्यारोपण के लिए सहायक होती हैं।

 यह प्रतिरक्षा मुख्य रूप से जीवाणु, जीवाण्वीय टॉक्सिन एवं देह तरल में उपस्थित वायरस को नष्ट करने के लिए होती हैं।

 

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