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समस्टियों
की पारस्परिक क्रियाएँ
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जाति अ
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जाति ब
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पारस्परिक क्रिया का नाम
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सहोपकारिता
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स्पर्धा
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परभक्षण
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परजीविता
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सहभोजिता
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अंतरजातीय परजीविता
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ऐसे किसी भी आवास की कल्पना नहीं की जा सकती जहाँ
केवल एक ही जाति का वास हो, क्योंकि ऐसा कोई आवास है ही नहीं और
इसलिए ऐसी पारिस्थितिकी अकल्पित है। किसी भी जाति के लिए न्यूनतम आवश्यकता एक और
जाति की है जिसको वह भोजन के रूप में ले सके। पादप जाति भी जो अपना आहार स्वयं
बनाती है, अकेली जीवित नहीं रह सकती; इसे
मृदा के कार्बनिक पदार्थ को तोडने और अकार्बनिक पोषकों को इसके अवशोषण के लिए
लौटने के लिए मृदा के सूक्ष्मजीवों की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा बिना प्राणी
एजेंट के पादप परागण की व्यवस्था कैसे करेगा? यह स्पष्ट है कि
प्रकृति में प्राणी, पादप और सूक्ष्मजीव न तो पृथक रह सकते
हैं और न ही रहते हैं, बल्कि जैव समुदाय बनाने के लिएा
विभिन्न तरीकों से परस्पर क्रिया करते है। न्यूनतम समुदायों में भी, अनेक परस्पर क्रियाशील अनुबंधताएँ होती हैं, हालाँकि
सभी बंधताएँ आसानी से दिखाई नहीं देती।
टंतराजातीय पारस्परिक क्रियाएँ दो भिन्न जातियों की
समष्टियों की पारस्परिक क्रिया से उत्पन्न होती है। वे क्रियाएँ एक जाति या दोनों
जातियों के लिए हितकारी, हानिकारक या उदासीन हो सकती है।
लाभदायक पारस्परिक क्रियाओं के लिए ‘$’ चिह्न तथा हानिकारक
के लिए ‘-’ चिह्न और उदासीन के लिए ‘0’ चिह्न से दर्शाते हैं।
एक दूसरे से पारस्परिक क्रिया में- सहोपकारिता में
दोनों जातियों को लाभ होता है और स्पर्धा में दोनों को हानि होती है। परजीविता और
परभक्षण दोनों में केवल एक जाति को लाभ होता है (क्रमशः परजीवी और परभक्षी को) और
पारस्परिक क्रिया दूसरी जाति (क्रमशः परपोषी और शिकार) के लिए हानिकारक है। ऐसी
पारस्परिक क्रिया जिसमें एक जाति को लाभ होता है और दूसरी जाति को न लाभ होता है न
हानि। उसे सहभोजिता कहते है। दूसरी ओर अंतरजातीय परजीविता में एक जाति को हानि
होती है जबकि दूसरी जाति अप्रभावित रहती है। परभक्षण, परजीविता और सहभोजिता इन तीनों की एक साझा विशेषता है - पारस्परिक क्रिया
करने वाली जातियाँ निकटता से साथ-साथ रहती है।
(क) परभक्षण -
यदि किसी समुदाय में पादपों को खाने के लिए प्राणी ही
न हों तो स्वपोषी जीवों द्वारा स्थिर की गई उस सारी उर्जा का क्या होगा? परभक्षण को आप प्रकृति का ऐसा तरीका सोच सकते हैं जिसमें पादपों द्वारा
स्थिर की गई उर्जा पोषी स्तरों को स्थानांतरित होती है। जब हम परभक्षी और शिकार के
बारें में सोचते हैं तो शायद बाघ और हरिण का उदाहरण सहज ही हमारे दिमाग में आता है,
लेकिन बीज को खाने वाली गोरैया भी परभक्षी से कम नहीं। हालाँकि
पौधों को खाने वाले प्राणियों को शाकाहारी के रूप् में अलग श्रेणी में रखा जाता है,
लेकिन सामान्य पारिस्थितिक संदर्भ में वे भी परभक्षी से ज्यादा
भिन्न नहीं हैं।
पोषी स्तरों तक उर्जा स्थानांतरण के लिए संनाल
(कंड्यूट) के रूप में कार्य करने के अलावा, परभक्षी एक दूसरी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे शिकार समष्टि को नियंत्रण रखते हैं। अगर परभक्षी
नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत ज्यादा हो जाता और पारितंत्र में
अस्थिरता आ जाती। जब किसी भौगोलिक क्षेत्र में कुछ विदेशज जातियाँ लाई जाती हैं तो
वे आक्रामक हो जाती हैं और तेजी से फैलने लगती हैं क्योंकि आक्रांत भूमि में उसके
प्राकृतिक परभक्षी नहीं होते। 1920 के आरंभ में आस्ट्रेलिया
में लाई गई नागफनी ने वहाँ लाखों हेक्टेयर प्रक्षेत्र में तेजी से फैलकर तबाही मचा
दी। अंत में नागफनी खाने वाले परभक्षी को उसके प्राकृतिक आवास ऑस्ट्रेलिया लाए
जाने के बाद ही आक्रामक नागफनी को नियंत्रित किया जा सका। कृषि पीड़कनाशी के
नियंत्रण में अपनाए गए जैव नियंत्रण विधियाँ परभक्षी की समष्टि नियमन की योग्यता
पर आधारित है। परभक्षी, स्पर्धी शिकार जातियों के बीच
स्पर्धा की तीव्रता कम करके किसी समुदाय में जातियों की विविधता बनाए रखने में भी
सहायता करती है। अमेरीकी प्रशांत तट की चट्टानी अंतराज्वारीय समुदायों में
पाइसैस्टर तारामीन एक महत्वपूर्ण परभक्षी है। प्रयोगशाला के बाहर किए गए एक प्रयोग
में जब एक बंद अंतराज्वारीय क्षेत्र से सभी तारामीन हटा दी गई तो अंतराज्वारीय
स्पर्धा के कारण एक साल में ही अकशेरूकियों की 10 से अधिक
जातियाँ विलुप्त हो गई।
अगर परभक्षी ज्यादा ही दक्ष है और अपने शिकार का
अतिदोहन करता है तो हो सकता है शिकार विलुप्त हो जाए और इसके बाद खाने के अभाव में
परभक्षी भी विलुप्त हो जाएगा। यही कारण है कि प्रकृति में परभक्षी ‘विवेकी’ है। परभक्षण के प्रभाव को कम करने के लिए
शिकारी जातियों ने विभिन्न रक्षा विधियाँ विकसित कर ली है। कीटों और मेंढकों की
कुछ जातियाँ परभक्षी द्वारा आसानी से पहचान लिए जाने से बचने के लिए गुप्तरूप् से
रंगीन होती है। कुछ शिकार जातियाँ विषैली होती है और इसलिए परभक्षी उन्हें नहीं
खाते। मॉनार्क तितली के शरीर में विशेष रसायन होने के कारण यह अपने परभक्षी के लिए
बहुत ही अरूचिकर, यानि स्वाद में खराब है। यह दिलचस्प है कि
तितली इस रसायन को अपनी इल्ली अवस्था में विषैली खरपतवार खाकर प्राप्त करती है।
पौधों के लिए शाकाहारी प्राणी परभक्षी है। लगभग 25 प्रतिशत कीट पादपभक्षी है अर्थात् वे पादप रस और पादपों के अन्य भाग खाते
है। पादपों के लिए यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है; क्योंकि
वे अपने परभक्षियों से दूर नहीं भाग सकते जैसा कि प्राणी कर सकते है। इसलिए पादपों
ने शाकाहारियों से बचने के लिए आश्चर्यजनक रूप् से आकारिकीय और रासायनिक
रक्षाविधियाँ विकसित कर ली है। रक्षा के सबसे सामान्य आकारिकीय साधन कांटे। बहुत
से पादप एसे रसायन उत्पन्न करते हैं जो खाए जाने पर शाकाहारियों को बीमार कर देते
है। पाचन का संदमन करते है, उनके जनन को भंग कर देते हैं या
मार तक देते है। आपने परित्यक्त खेतों में उग रही कैलोट्रोपिस खरपतवार अवश्य देखी
होगी। यह पौधा अत्यधिक विषैला ह्रदय ग्लाइकोसाइड उत्पन्न करता है और इसी कारण आपने
कभी भी पशु या बकरी को इस पौधे को चरते हुए नहीं देखा होगा। रासायनिक पदार्थों की
व्यापक किस्में; जिन्हें हम पौधों से व्यापारिक पैमाने पर
निष्कर्षित करते हैं (निकोटीन, कैफीन, क्वीनीन,
स्ट्रिकनीन, अफीम आदि।) वे पादपों द्वारा
उत्पन्न होते हैं। वास्तव में रसायन चारकों से बचने की रक्षाविधियाँ हैं।
(ख) स्पर्धा -
जब डार्विन ने प्रकृति में जीवन संघर्ष और योग्यतम की
उतरजीविता के बारे में कहा तो वह निश्चयी था कि जैव विकास में अंतरजातीय स्पर्धा
एक शक्तिाशाली बल है। आमतौर पर यह माना जाता है कि स्पर्धा उस समय शुरू होती है जब
निकट से संबंधित जातियाँ उन्हीं संसाधनों के लिए स्पर्धा करती है जो सीमित है, लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि ये असंबंध
जातियाँ भी एक ही संसाधन के लिए स्पर्धा कर सकती है। उदाहरण के लिए दक्षिण अमेरीका
की कुछ उथली झीलो में आगंतुक फ्लेमिंगो और वहीं की आवासी मछलियाँ साझा आहार,
झील में प्राणीप्लवक के लिए स्पर्धा करती हैं। दूसरी बात है,
स्पर्धा के संसाधनों का सीमित होना आवश्यक है। बाधा स्पर्धा में एक
जाति की अशनदक्षता दूसरी जाति की बाधाकारी और संदमनी उपस्थिति के कारण घट सकती है।
भले ही संसाधन र्प्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। इसलिए, स्पर्धा
को एक ऐसे प्रक्रम के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें
एक जाति की योग्यता दूसरी जाति की उपस्थिति में महत्वपूर्ण रूप् से घट जाती है।
प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में यह दर्शाना अपेक्षाकृत आसान है जैसा कि गॉसे
और दूसरे पारिस्थितिकविज्ञों ने किया, कि जब संसाधन सीमित
होते हैं तो स्पर्धीरूप् से उतम जातियाँ अंततः दूसरी जातियों को विलुप्त कर देगी,
लेकिन प्रकृति में इस प्रकार के स्पर्धी बहिष्कार के साक्ष्य हमेशा
निर्णायक नहीं होते। लेकिन कुछ मामलों में ठोस और स्वीकार्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य
मिलते तो है। गैलापैगों द्वीप में बकरियाँ लाई जाने के बाद एबिंग्डन कुछ एक दशक
में ही विलुप्त हो गए जिसका स्पष्ट कारण था। बकरियों की अत्यधिक चारण दक्षता
प्रकृति में स्पर्धा होने को दूसरा प्रमाण ‘स्पर्धी मोचन’
हैं। स्पर्धीरूप् से उत्तम जाति की उपस्थिति के कारण जिस जाति का
वितरण छोटे से भौगोलिक क्षेत्र तक प्रतिबंधित हो गया है। स्पर्धी जाति को
प्रयोगात्मक रूप से हटा दिए जाने पर उसकी वितरण परास नाटकीय ढंग से फैल जाती है।
कॉनेल के परिष्कृत क्षेत्र प्रयोगों ने दर्शाया है कि स्कॉटलैंड के चट्टानी समुद्र
तटों पर बड़े और स्पर्धीरूप से उत्तम बार्नेकल बैलेनस की अंतरज्वारीय क्षेत्र में
प्रमुखता है और इसने छोटे बार्नेकल चैथेमैलस को उस क्षेत्र से निकाल दिया। आमतौर
पर, माँसाहारियों की अपेक्षा शाकाहारी और पादप अधिक
प्रतिकूलतः प्रभावित होते हैं।
गॉसे का स्पर्धी अपवर्जन का नियम - यह नियम यह बताता
है कि एक ही तरह के संसाधनों के लिए स्पर्धा करने वाली दो निकटतम से संबंधित
जातियाँ अनंतकाल तक साथ-साथ नहीं रह सकती और स्पर्धीरूप् से घटिया जाति अंततः
विलुप्त कर दी जाएगी। ऐसा तभी होगा जब संसाधन सीमाकारी होंगे अन्यथा नहीं। अधिक
वर्तमान अध्ययन स्पर्धा के ऐसे घोर सामान्यीकरण की पुष्टि नहीं करते। वे प्रकृति
में अंतराजातीय स्पर्धा होने को नकारते तो नहीं पर वे इस ओर ध्यान दिलाते हैं
स्पर्धा सामना करने वाली जातियाँ ऐसी क्रियाविधिविकसित कर सकती हैं जो बहिष्कार की
बजाय सह-अस्तित्व को बढ़ावा दे। ऐसी एक क्रियाविधि ‘संसाधन
विभाजन’ है। अगर दो जातियाँ एक ही संसाधन के लिए स्पर्धा
करती हैं तो उदाहरण के लिए वे अशन के लिए भिन्न-भिन्न समयअथवा भिन्न चारण
प्रतिरूप् चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं। मैक आर्थर ने दिखाया कि एक ही पेड़ पर रह
रहीं फुदकी (वार्बलर) की पाँच निकटतः संबंधित जातियाँ स्पर्धा से बचने में सफल
रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिए तलाशने की अपनी चारण
गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ-साथ रह सकी।
(ग) परजीविता -
यह मानते हुए कि जीवन के परजीवी प्रणाली में रहने और
खाने की मुफ्त व्यवस्था है तो यह आश्चर्य की बात नहीं है कि परजीविता, पादपो से लेकर उच्च कोटि कशेरूकियों तक इतने अधिक वर्गिकीय समूहो में
विकसित हुआ है। अनेक परजीवी-परपोषी विशिष्ट के रूप में विकसित हुए है(वे परपोषी
केवल एक ही जाति पर परजीवी जीवन बिताते है), इस प्रकार
परपोषी और परजीवी दो सह-विकसित होते हैं; अर्थात् एक ही
परपोषी जाति के साथ सफल होने के लिए अगर परपोषी परजीवी को अस्वीकार करने या
प्रतिरोध करने के लिए विशिष्ट साधन विकसित करता है तो परजीवी को उन साधनों को
निष्प्रभावी और व्यर्थ करने के लिए साधन विकसित करने होंगे। अपनी जीवन शैली के
अनुरूप् परजीवी ने विशेष अनुकूल विकसित किए जैसे कि अनावश्यक संबंधी अंगों का अभाव
परपोषी से चिपकने के लिए आसंजी अंगो या चूषकों की उपस्थिति, पाचन
तंत्र का लोप तथा उच्च जनन क्षमता। परजीवियों का जीवन चक्र प्रायः जटिल होता है
जिसमें एक या दो मध्यस्थ पोषक अथवा रोगवाहक होते हैं जो इसके प्राथमिक परपोषी के
परजीवीकरण को सुगम बनाते हैं। मानव यकृत पर्णाभ अपने जीवन चक्र को पूरा करने के
लिए दो मध्यस्थ पोषकों जैसे घोंघा और मछली पर निर्भर करता है। मलेरिया परजीवी को
दूसरे परपोषियों पर फैलने के लिए रोगवाहक की आवश्यकता पड़ती है। अधिकांश परजीवी,
परपोषी को हानि पहुँचाते हैं; परपोषी की
उत्तरजीविता, वृद्धि और जनन को कम कर सकते हैं और उसके
समष्टि घनत्व को घटा सकते हैं। वे परपोषी को कमजोर बनाकर उसे, परभक्षण के लिए अधिक असुरक्षित बना देते हैं।
परपोषी जीव की बाह्य पृष्ठ पर अशन करने वाले परजीवी, बाह्य परजीवी कहलाते हैं। इसके प्रसिद्ध उदाहरण मानवों पर जूँ के समूह और
कुत्तों पर चिचिंडियाँ हैं। अनेक समुद्री मीन बाह्य परजीवी अरित्रपादों
(कॉपिपोड्स) द्वारा ग्रस्त हैं। कस्कुटा एक परजीवी पौधा है जो सामान्यतः बाड़
पादपों पर वृद्धि करता है। विकास प्रक्रिया के दौरान इसका पर्णहरित और पत्तियाँ
समाप्त हो जाती है। यह जिस पोषी पादप पर रहता है उसी से अपना पोषण लेता हैं। मादा
मच्छर को परजीवी नहीं माना जता हालाँकि जनन के लिए इसको हमारे रक्त की आवश्यकता
पड़ती हैं। क्या आप बता सकते हैं क्यों?
इसके विपरीत, अंतःपरजीवी वे हैं
जो परपोषी के शरीर में भिन्न स्थलों यकृत, वृक्क, फुफ्फुस, लाल रूधिर कोशिका आदि पर रहते हैं। उनके
आकारिकीय और शारीरिय लक्षण अत्यधिक सरलीकृत होते हैं जबकि उनके जनन शक्ति को बल
देते हैं।
पक्षियों में अंड परजीविता परजीविता (ब्रूड
पैरासिटिज्म) का लुभावना उदाहरण है जिसमें परजीवी पक्षी अपने अंडे परपोषी के
घोंसले में देता है और परपोषी उन अंडों को सेने देता है। विकास प्रक्रिया के दौरान, परजीवी पक्षी के अंडे के साइज और रंग में परपोषी के अंडों के सदृश विकसित
हो गए ताकि परपोषी पक्षी द्वारा विजातीय अंडों को पहचान लिए जाने और घोंसलें से
उन्हें निकाल दिए जाने की संभावना कम हो जाए।
(घ) सहभोजिता -
यह ऐसी पारस्परिक क्रिया है जिसमें एक जाति को लाभ
होता है और दूसरी को न हानि न लाभ होता है। आम की शाखा पर अधिपादप (एपिफाइट) के
रूप में उगने वाला आर्किड और व्हेल की पीठ को आवास बनाने वाले बार्नेकल को फायदा
होता है जबकि आम के पेड और व्हेल को उनसे कोई लाभ नहीं होता। पक्षी बगुला और चारण
पशु निकट साहचर्य में रहते है। यदि आप कृषि फार्म वाले ग्रामीण क्षेत्र में रहते
हैं तो आपको यह दृश्य देखने को मिलेगा। सहभोजिता का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ
पशु चरते हैं उसके पास ही बगुले भोजन प्राप्ती के लिए रहते हैं क्योंकि जब पशु
चलते हैं तो वनस्पति को हिलाते हैं और उसमें से कीट बाहर निकालते हैं। बगुले उन
कीटों को खाते है अन्यथा वानस्पतिक कीटों को ढूंढना और पकड़ना बगुले के लिए कठिन
होता। सहभोजिता का दूसरा उदाहरण समुद्री ऐनीमोन दंशन स्पर्शक (स्टिंगिंग टेंटेकल)
होते हैं,
जिसमें उनके बीच रहने वाली क्लाउन मछली का है। मछली को परभक्षियों
से सुरक्षा मिलती है। जो दंशन स्पर्शकों से दूर रहते हैं। क्लाउन मछली से ऐनीमोन
को कोई लाभ मिलता हो ऐसा नहीं लगता।
(ड) सहोपकारिता -
इस पारस्परिक क्रिया से परस्पर क्रिया करने वाली
दोनों जातियों को लाभ होता है। कवक और प्रकाशसंश्लेषी शैवाल या सायनो बैक्टीरिया
के बीच घनिष्ठ सहोपकारी (म्यूच्युऑलिस्टिक) संबंध का उदाहरण लाइकेन में देखा जा
सकता है। इसी प्रकार कवको और उच्च कोटि पादपों की जड़ों के बीच कवकमूल साहचर्य है।
कवक,
मृदा से अत्यावश्यक पोषक तत्वों के अवशोषण में पादपों की सहायता
करते है। जबकि बदले में पादप, कवकों को उर्जा-उत्पादी कार्बोहाइड्रेट
देते है।
सहोपकारिता के सबसे शानदार और विकास की दृष्टि से
लुभावने उदाहरण पादप-प्राणी संबंध में पाए जाते हैं। पादपों को अपने पुष्प परागित
करने और बीजों के प्रकीर्णन के लिए प्राणियों की सहायता चाहिए। स्पष्ट है कि पादप
को जिन सेवाओं की अपेक्षा प्राणियों से हैं उसके लिए ‘शुल्क’ तो देना होगा। पुरस्कार अथवा शुल्क के रूप
में परागणकारियों (पॉलिनेटर) को पराग और मकरंद तथा प्रकीर्णकों को रसीले और पोषक
फल देते है। लेकिन परस्पर लाभकारी तंत्र की ‘धोखेबाजी’
से रक्षा होनी चाहिए, उदाहरण के लिए, ऐसे प्राणी जो परागण में सहायता किए बिना ही मकरंद चुराते हैं। अब आप देख
सकते हैं कि पादप प्राणी पारस्परिक क्रिया में सहोपकारियों के लिए प्रायः ‘सहविकास’ क्यों शामिल है, अर्थात्
पुष्प् और इसके परागणकारी जातियों के विकास एक दूसरे से मजबूती से जुडे हुए हैं।
अंजीर के पेड़ों की अनेक जातियों में बर्र की परागणकारी जातियों के बीच मजबूत संबंध
हैं। इसका अर्थ यह है कि कोई दी गई अंजीर जाति केवल इसके ‘साथी’
बर्र की जाति से ही परागित हो सकती हैं, बर्र
की दूसरी जाति से नहीं। मादा बर्र फल को न केवल अण्डनिक्षेपण के लिए काम में लेती
हैं; बल्कि फल के भीतर ही वृद्धि कर रहे बीजों को डिम्बकों
के पोषण के लिए प्रयोग करती हैं। अण्डे देने के लिए उपयुक्त स्थल की तलाश करते हुए
बर्र अंजीर पुष्पक्रम को परागित करती है, इसके बदले में अपने
कुछ परिवर्धनशील बीज, परिवर्धनशील बर्र के डिम्बकों को आहार
के रूप में देती है।
आर्किड
पुष्प प्रतिरूपों की आश्चर्यचकित कर देने वाली विविधता दर्शाते हैं जिसमें से अनेक
सही परागणकारी कीट (भ्रमरों और गुंज मक्षिकाओं) को आकर्षित करने के लिए विकसित हुए
हैं ताकि इसके द्वारा निश्चितरूप् से परागण हो सके। सभी आर्किड यह पुरस्कार पेश
नहीं करते। ऑफ्रिस नाम भूमध्य सागरीय मेडिटेरेनियन आर्किड मक्षिका के एक जाति
परागण कराने के लिए ‘लैंगिक कपट’ का
सहारा लेता है। इस पुष्प की एक पंखुडी साइज, रंग और चिह्नों
में मादा मक्षिका से मिलती-जुलती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित
होती है, पुष्प् के साथ ‘कूट मैथून’
करती है। इस प्रक्रम के दौरान इस पर पुष्प से पराग झड़कर उस पर गिरते
हैं जब वही मक्षिका दूसरे पुष्प से ‘कूट मैथून’ करती है तो यहाँ शरीर पर लगे पराग डालती है और इस प्रकार पुष्प् को परागित
करती है। मगर विकास के दौरान किसी भी कारण से मादा मक्षिका का रंग प्रतिरूप जरा-सा
भी बदल जाता है तो परागण की सफलता कम रहेगी अतः आर्किड पुष्प् अपनी पंखुडी को मादा
मक्षिका के सदृश बनाए रखते हैं।
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