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पादपों में उत्सर्जन (Excretion in Plants)

  पादपों में जन्तुओं की भांति उत्सर्जन अंग (Excretory Organs) व तंत्र नहीं पाए जाते हैं। पादपों में उत्सर्जन की प्रक्रिया भी जन्तुओं की अपेक्षा सरल होती हैं। पादपों में उत्सर्जन की प्रक्रिया सरल होने के निम्न कारण माने जाते हैं :- 1. पादपों में उपापचयी क्रियायों की दर, जंतुओं की अपेक्षा कम होना। इसीलिए उपापचयी क्रियायों से अपशिष्ट पदार्थों के निर्माण की दर भी जंतुओं की अपेक्षा कम होती हैं। 2. अनावश्यक पदार्थो का पर्ण की मृत कोशिकाओं में या तने की काष्ठीय कोशिकाओं में संग्रहित होना। 3. कई अपशिष्ट पदार्थों का घुलित अवस्था में रिक्तिकाओ में पाया जाना, जिसके फलस्वरुप ये पदार्थ कोशिकाओं की विभिन्न जैविक क्रियाओ में बाधक नही होते हैं। 4. पौधों द्वारा अपचयी क्रियायों में बने अधिकांश अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग उपापचयी क्रियायों में कर लिया जाता हैं। 5. प्रोटीन उपापचय में बने नाइट्रोजनी अपशिष्ट उत्पादों का उपयोग प्रोटीन-संश्लेषण (Protein Synthesis) में कर लिया जाता हैं। 6. जलीय पादपों में विसरण (Diffusion) की प्रक्रिया द्वारा उत्सर्जी/अपशिष्ट पदार्थों को त्याग दिया जाता हैं। 7. स्थलीय पादपों में
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प्रोटोजोआ जनित रोग (Protozoan Diseases)

1. अमीबीएसिस (Amoebiasis) - रोगजनक (Pathogen) - एन्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolitica) । लक्षण (Symptoms) - ग्रसित व्यक्ति के मल के साथ म्यूकस व रक्त निकलता हैं। आंतों में ऐंठन होती हैं। बड़ी आंतों (कोलन) में अल्सर हो जाते हैं , यकृत को प्रभावित करता हैं , जिससे अमीबीय हिपेटाइटिस हो जाता हैं। बचाव के उपाय (Precautions) - सब्जियों को भली-भांति धोकर उपयोग में लेना , अमीबीय पुटिकाओं को क्लोरीन , फीनॉल , क्रीसोल द्वारा नष्ट किया जाना चाहिए। उपचार (Treatment) - प्रतिजैविक पदार्थों जैसे- टेट्रासाइक्लीन (Tetracycline), टेरामाइसीन (Pteromycine) का उपचार में उपयोग किया जाता हैं।   2. मलेरिया (Malaria) 🦟 - मलेरिया मनुष्य में मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से फैलता हैं। मच्छर की लार में प्लाज्मोडियम रोगजनक उपस्थित होता हैं। रोगजनक (Pathogen) - प्लाज्मोडियम (Plasmodium) की चार जातियां हैं , जो कि निम्नानुसार हैं - Ⅰ . प्लाज्मोडियम वाइवेक्स (P. vivax) Ⅱ . प्लाज्मोडियम ऑवेल (P. ovel) Ⅲ . प्लाजमोडियम मलैरी (P. malari) Ⅳ . प्लाज्मोडियम फैल्सीफेरम (P. f

वायरस जनित रोग (Viral Diseases)

1. पोलियो [Polio] - रोगजनक (Pathogen) - पोलियो वायरस व एन्टेरोवायरस (Polio virus & Antero virus) । एन्टेरोवायरस (Antero virus) सबसे छोटा वायरस हैं। संचरण (Transmission) - वायु एवं जल द्वारा। लक्षण (Symptoms) - मेरूरज्जु , मस्तिष्क एवं पैर प्रभावित , बुखार आना , माँसपेशियों का सिकुड़ना , प्रभावित हाथ/पैर का विकास धीमा , सिर दर्द , उल्टी , गर्दन में दर्द , तंत्रिका तंत्र के नष्ट होने से प्रभावित हाथ या पैर का कार्य करना बंद। 6 माह से 3 वर्ष के बच्चों को पोलियों हो सकता हैं। बचाव के उपाय (Precautions) - पोलियो की दवा पिलाकर। उपचार (Treatment) - चिकित्सकीय निर्देशानुसार ऑपरेशन , जयपुर फुट का उपयोग , फिजियोथेरेपी आदि।   2. रेबीज (जलांतक) [Rabies] 🐕🐶 - रोगजनक (Pathogen) - रेबीज वायरस (Rabies virus) । संचरण (Transmission) - संक्रमित कुत्ता , बंदर , लोमड़ी , भेड़िया जिनकी लार में रेबीज वायरस होते हैं। लक्षण (Symptoms) - तेज बुखार आना , सिर दर्द , बैचेनी , कंठ का अवरूद्ध होना , पानी से डर लगना। बचाव के उपाय (Precautions) - आवारा कुत्तों तथा बिल्लियों

जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases)

1. तपेदिक या क्षय रोग (Tuberculosis or TB) - इसे सामान्यतया टीबी कहते हैं। रोगजनक (Pathogen) - माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Micro-bacterium tuberculosis) ।      संचरण (Transmission) - वायु द्वारा। लक्षण (Symptoms) - थकान लगना , शरीर का वनज कम होना , कफ के साथ रक्त आना , जुकाम तथा बुखार होना , छाती में दर्द रहना , आवाज भारी होना , ज्यादा चलने पर सांस फूलना , लसिका ग्रन्थि का फूलना , आहार नाल व फेंफड़ें प्रभावित। रोग का प्रसार (Disease transmission) - टीबी रोगी के साथ सोने , बैठने , उठने , खाने-पीने से , कुपोषण से , संक्रमित पशु (गाय , बकरी) का दूध पीने से , संक्रमित व्यक्ति की उपयोग की गई वस्तुओं के उपयोग से , धूम्रपान , हुक्कापान व तम्बाकू सेवन से। बचाव के उपाय (Precautions) - क्षय रोगी को अलग रखना , उसकी व्यक्तिगत वस्तुओं को अलग रखना , उचित समय पर टीकाकरण , कहीं भी नहीं थूकना , खांसते समय मुंह पर कपड़ा या रूमाल रखना चाहिए। उपचार (Treatment) - उपचार हेतु स्ट्रेप्टोमाइसिन , विटामिन बी-कॉम्पलेक्स तथा आइसोनिएजिड उपयोगी औषधियां हैं। बचाव के लिए BCG (Bacillus

कुपोषण के कारण होने वाले रोग (Diseases due to Malnutrition)

1. प्रोटीन की कमी के कारण होने वाले रोग (Diseases due to Protein deficiency) - मनुष्य को शारीरिक विकास के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती हैं। बच्चों में प्रोटीन की कमी से सर्वाधिक कुपोषण होता हैं। जिससे दो मुख्य रोग होते हैं -   Ⅰ . क्वाशियोरकोर (Kwashiorkor) - यह प्रोटीन की कमी के कारण हाने वाला रोग हैं। इसके मुख्य लक्षण जैसे- भूख कम लगना , शरीर सूज कर फूलना , त्वचा पीली व शुष्क होना और चिड़चिड़ा होना।   Ⅱ . मैरेस्मस (Marasmus) - यह रोग भोजन में प्रोटीन व कैलोरी दोनों की कमी से होता हैं। इसमें शरीर सूखने लगता हैं , रोगी दुबला-पतला , चेहरा दुर्बल तथा आंखें कांतिहीन और अंदर धंसी-सी हो जाती हैं।   2. कार्बोहाइड्रेट की कमी से होने वाले रोग (Diseases due to Carbohydrate deficiency) - स्ंतुलित भोजन में कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत होता हैं , इस कारण इसकी कमी से कई सारे गंभीर रोग हो जाते हैं।   Ⅰ . हाइपोग्लाईसीमिया (Hypoglycemia) - कार्बोहाइड्रेट की कमी से ग्लूकोज की शरीर में अनुपलब्धता से रक्त शर्करा के स्तर में गिरावट हो जाती हैं। रक्त में ग्लूकोज